शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

आपके जीवन में श्री, सौंदर्य, स्वास्थ्य तथा यश का
मंगल कलश सदा छलकता रहे

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

अनिल गंगल की कविता:- "करवा-चौथ का व्रत रखती एक औरत"



अहंकार से तनी रीढ़ का सामना करती
एक मार खाई औरत रखती है करवा-चौथ का व्रत
लाल आँखों और तनी हुई मूछों के अन्धकार में
एक गाली खाती औरत करती है करवा....
कहीं किसी भी खली जगह में जैसे-तैसे अंटती
अपनी सही-सही जगह खोज पाई एक अपमानित औरत
रखती है करवा...

जोड़-जोड़ टूटती पोर-पोर थकी
जनम-जनम से भूखी रही आई एक औरत
तीन वक्त के खाने से अघाए एक भरे पेट वाले पुरुष के लिए
रखती है व्रत...

व्रत करती औरत
निर्जला रह चाँद के दिखने की प्रतीक्षा करती है

दुर्दिनों से गुजरती औरत विश्वाश करती है
कि विश्वाश के सहारे फतह किये जा सकते हैं किले
और तीनों भुवन
हांफती-कराहती औरत करती है विश्वाश
कि सिर्फ वही है जिसके व्रत से नहीं मंडरायेंगी दुरात्मएं
उसके सुहाग के आस-पास भी
व्रत रखती एक औरत यम के हाथों से
एक पुरुष को छुड़ा लाने का रचती है मिथक
और खुद एक गाथा में बदल जाती है

सारा-सारा दिन निर्जला रहने के बावजूद
सुर्खरू आँखों की ललामी नहीं होती कम
तनी हुई मूछों का कसाव जरा भी नहीं पड़ता ढीला
सदियों से अकड़ आई रीढ़ झुकाती नहीं जरा भी
सहस्त्र पीढ़ियों के अपमान के ठूंठ से
उगती नहीं एक भी हरी कोंपल

सिर्फ उस रात ही नहीं
ताउम्र दिखता नहीं औरत को चाँद

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

विजेन्द्रजी हमारे समय की जीवंत काव्य विरासत है



वरिष्ठ कवि विजेंद्र हमारे समय की जीवंत काव्य विरासत है।

मठाधीश आलोचकों, तानाशाह संपादकों और महान कवियों के लाख नकारने के बाद भी

समय की छलनी ने यह साबित कर दिया है कि...वे हमारे जटिल समय के बहुत जरुरी कवि हैं।

समकालीन लोककविता (और लम्बी कविता) में चरित्र को लेकर उन्होंने जो प्रयोग किये हैं वे दुर्लभ हैं।

राजस्थान ही नहीं, पूरे हिंदी साहित्य को उन पर गर्व होना चाहिए।

मैं जनता हूँ राजस्थान में उनके साथ कितना औछा बर्ताव किया जाता रहा है।

उन पर शोध कार्य करवाने के लिए मुझे कितना संघर्ष विश्वविध्यालय के महान अध्यापकों से करना पड़ा था।

उनके अनुसार विजेंद्र की कविता पी-एच डी के योग्य ही नहीं थी।

ये बात वे लोग कह रहे थे जिनकी खुद की थीसिस प्रमाणिक रूप से आपत्तिजनक थी।

बहरहाल विजेंद्रजी पर अब एक नहीं लगभग दस जगह पी-एच डी हो रही है।

राजस्थान मैं यह शुरुआत मेरे संघर्ष से मेरे निर्देशन मैं हुई है। देर से ही सही शुरुआत तो हुई है।

"घर का जोगी जोगना, आन गाँव का सिद्ध" ज्यादा दिन तक सही नहीं रह सकता।

अब जड़ताएँ तोड़ने का समय है, और तोड़ी भी जा रही है.....

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

गाँव के बच्चे

कविता-

दूरदराज गाँव के बच्चे
अभ्यस्त हैं
अपनी भेड़-बकरियां चराने के
मुंह-अँधेरे
उठा देती है माँ
गाय-भेंसों का
गोबर थापने के लिए
और चलता कर देती है
दिन चढ़ते ही कांकड़ में
प्याज और रोटी देकर
भेड़-बकरियों के साथ......

खुले आकाश के नीचे
काँटों की बाड़ में
चल रही पाठशाला के
पास से गुजरते हुए
वे झांकते हैं पलभर को
पाठशाला के भीतर, और
'
दो दूनी चार' की रट में
रेवड़ से बिछुड़ गई
अपनी बकरी को
बुलाने की टेर मिलाते हुए
दौड़ जाते हैं उसकी ओर!
वे अभ्यस्त हैं
रोज ही पाठशाला को
अपने से पीछे छोड़ जाने के!
.................................................................






सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

कई ऐसा तो नहीं प्रभातजी
कि बाज़ार ने पिता को भी out dated commodity में बदल दिया हो.......

मेरी एक छोटीसी कविता है----




रविवार, 3 अक्टूबर 2010




कई ऐसा तो नहीं प्रभातजी
कि बाज़ार ने पिता को भी out dated commodity में बदल दिया हो.......

मेरी एक छोटीसी कविता है----

रविवार, 26 सितंबर 2010


राम
दशरथ पुत्र राम
अजोध्या के राम
तुलसी के राम
कबीर के राम
१९९२ की अजोध्या के राम
अब की अजोध्या के राम
जन-जन के राम
और
हिंदुत्व वादियों के राम

राम तेरे कितने रूप ...........
किसी समय लिखी मेरी कुछ पंक्तियाँ.......

"तेरे लिए भी कोई राय बनी है कहीं,
तेरे हक़ में भी कोई मुट्ठी तनी है कहीं
राख के ढेर पर बैठ कर अफ़सोस कर,
हो सकता है कोई चिंगारी दबी हो कहीं

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

________________ तसल्ली इन्सान को अपने अधिकारों के लिए लड़ने नहीं देती!

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

भाई सिर्फ इतना ही कहूँगा. जड़ता और कट्टरता उधार भी है इधर भी है. मेरा परिवार भी विभाजन की त्रासदी झेल चुका है. सब कुछ वहीँ छोड़ कर आना पड़ा था. मेरे कई परिजन आज भी पाकिस्तान में हैं और खुश हैं, समृद्ध हैं हमें हिन्दू होते हुए भी आपके तथा कथित हिन्दुओं ने हमेशा शरणार्थी कहकर प्रताड़ित किया और आज भी कर रहे हैं. दोयम दर्जे का नीचतापूर्ण व्यावहार. फिर भी यही कहूँगा आज भी पाकिस्तान में हिन्दू हैं, और भारत में मुसलमान, तो इस लिए की कुछ इंसानियत लोगों में बाकि है
हमारे माता-पिता बताते हैं की उस समय कैसे मुसलमानों ने हिन्दुओं को अपने घरों में पनाह दी, उनकी जान और इज्जत की हिफाजत कीभारत में हिन्दुओं ने भी यही किया
वो कमीने दहशत-गर्द तो कोई और ही थे जो दोनों कौमों में छिपे बेठे थेऔर बेगुनाह मासूमों का खून बहा रहे थे
आपतो किराये का हिंदुत्व और उसकी पीड़ा लेकर लड़ने को तैयार रहतें हैंहम तो भुक्त भोगी हैं, हम जानते हैं सचाई क्या है
इस लिए मासूमों को बरगलाना छोडिये, सत्ता की भूख त्यागिये और इस देश को खुली साँसें लेकर बढ़ने-विकसित होने दीजिये. हवाओं में जहर घोलने की कोशिस मत कीजिये
बस एक बात और---- लोग अब समझने लगे हैं कि किसकी क्या मंसा है. इस लिए सब लोगों के विवेक पर छोड़ दीजिये. वे भी अन्न खाते हैं भाई साहब. और जानते है कि सच क्या है.
मैं समजता हूँ कि अब इस विषय में संवाद कि और जरुरत नहीं है.

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

भगवा आतंकवाद के बरक्श बाबा नागार्जुन!

भगवा आतंकवाद के बरक्स बाबा नागार्जुन!

अपनी "शपथ" कविता में बाबा ने लिखा है-

"कांटे कहाँ, रोड़े हैं
कहाँ गढ़ा है, कहाँ रेत है
सभी साफ हो गया आज, जनता सचेत है
कोटि-कोटि कंठों से निसृत सुन-सुनकर आक्रोश
भगवाध्वजधारी दैत्यों के उड़े जा रहे होश।"

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

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स्त्री-विमर्श बेवफाई का विराट उत्सव नहीं! रचनाधर्मिता का नवलोक है!

स्त्री-विमर्श बेवफाई का विराट उत्सव नहीं! रचनाधर्मिता का नवलोक है!
ये पुरुषों के रमण-लोक को ध्वस्त करने का सार्थक हथियार है।


विभूति नारायण रॉय के साक्षात्कार में जो चरित्र-हनन किया किया गया है वह साहित्य या समाज के लिए नयानहीं हैदलितों और स्त्रियों को प्रताड़ित-लांछित-उत्पीड़ित करना तो शगल है "बड़े लोगों" काचाहे "चमड़िया-प्रसंग" हो या का "ज्ञानोदय" का तथाकथित "विराट बेवफाई" प्रसंग, दलित और स्त्रियाँ अब विभूति बाबु जैसे तथाकथित प्रगतिशीलों की छद्म प्रगतिशीलता से बहार की चीज़ हो गया है!
कुछ नामी-गिरामी पुरुष लेखकों की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आने पर या उनके द्वारा विभूतिनारायण राय के पक्ष में गाली देने पर चोंकने वाली कोई बात नहीं है! क्या आज भी हम (पुरुषलेखक) मन से स्त्री लेखकों के "चेतावनी से चुभते व्यक्तित्व" को झेल पाए हैं? क्या हमारा दंभ अभी तक भी एक स्वतंत्र इकाई" के रूप में स्त्री को स्वीकार पाया है?
विभूति बाबु की टिपण्णी तो एक फुसफुसाहट हैवास्तविकता तो और भी भयानक है जाने कितना भरा हुआ है ये 'मर्द' भीतर से? और शायद 'डरा' हुआ भी है!
सितम्बर २०१० के "हंस" के सम्पादकीय ने भी बड़ा दुःख दिया। राजेंद्र जी ऐसा लिखेंगे, विश्वास नहीं हुआ!
महिला आयोग की गिरिजा व्यास ने आपराधिक मामला दर्ज करने और कपिल सिब्बल ने माफ़ी मांगने की बातकही पर स्त्री लेखकों ने माफ़ी मांगने को ना काफी माना हैइतने गंदे आरोप लगा कर माफ़ी मांगना क्या स्त्री लेखकों के विरुद्ध दूसरा बड़ा अनाचार नहीं होगा?
क्या दलित और स्त्री के खिलाफ ऐसे अपराधों की सजा सिर्फ माफ़ी है?
जिन साहित्यकारों ने ज्ञानपीठ से अपनी पुस्तकें वापस लेकर असहयोग की बात की है, उनका आभार!
क्या वे सभी साहित्यकार भी अपनी किताबें "ज्ञानपीठ" से वापस लेने का नैतिक कदम उठाएंगे जो जन- प्रगतिशील विचार के वाहक हैं और जिनकी चिंता के केन्द्र में स्त्री के साथ-साथआज के तमाम शोषित, पीड़ित, दलित, दमित, वंचित, लांछित और अवहेलित जन और उनके मौलिक अधिकारों के लिए किया जा रहा संघर्ष है।


सोमवार, 6 सितंबर 2010


"प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव है मेरे कवि का
जन
-मन में जो ऊर्जा भर दे, में उद्गाता हूँ उस रवि का।"
-बाबा नागार्जुन

विचार

किन्ही अनिल सोमित्र ( हिन्दुत्ववादी ) का फ्रेंड रिक्वेस्ट मेरे पास आया था। उनका "प्रोफाइल वाल" देख-पढ़कर जो जवाब उनके लिए मुझसे बन पाया वह आप सभी साथियों के अवलोकनार्थ पेश है।

उन्होंने कम्युनिष्टों के लिए लिखा है_

"कांग्रेसी कूडे पर ही कम्युनिस्टी कीडे पलते है. कम्युनिस्ट नेता हो या बौद्धिक हमेशा राज्याश्रय कीतलाश मे ही रहता है. कभी अंग्रेजो के साथ, तो कभी कांग्रेसियो के साथ. रुस और चीन के आश्रय को तो वेअपना अधिकार ही मनते है, संघी-भाजपाई राज्याश्रय से भी उन्हे परहेज नही. आजादी से पहले औरउसके बाद अनेक उदाहरण है।"

उन्होंने फिर लिखा____

सोनिया जी के नेतृत्व मे कांग्रेस के नेता - दिग्विजय सिह जी और चिदम्बरम जी "आतंकवाद कारंग-रोगन" कर रहे है, इस्लामी आतंक (हरा), माओवादी आतंक (लाल), सिख आतंक (.......) के बादअब " हिन्दू आतंक (भगवा)" की बात की गई है.. आप भी कुछ कहना चाहेंगे.....!

मैंने उनको लिखा है_____

भाई साहब, आपके सारे विचार, ----- नहीं-नहीं विचार नहीं! विचार तो कमबख्त कोम्युनिष्टों क़ी चीज है। आपके पवित्र वि ------ क्या कहूँ! !!!!!!!!! पवित्र-वचन। ओजस्वी-उद्बोधन। पढ़कर मन में विचार आता है कि जब कुछ कट्टर मुसलमानों के आतंक फ़ैलाने से सारी मुस्लिम कौम आतंकी हो सकती है तो फिर कुछ कट्टर हिन्दुओं के आतंक फ़ैलाने से "भगवा आतंकवाद" क्यों नहीं हो सकता। इतना पचाने का साहस तो हम हिन्दुओं में होना ही चाहिए!

मुस्लिम-आतंकवाद कहकर हम गर्व कर सकते हैं तो हिन्दू या भगवा आतंकवाद सुनकर गौरव करना भी हमें आना चाहिए न भाई साहब??

राज्याश्रय कम्युनिष्टों को कभी प्रिय रहा हो तो रहे। हम तथाकथित गैर कम्युनिष्ट हिन्दुओं को तो उनके पद्चीन्हों पर नहीं चलना चाहिए। न जाने क्यों हम दूसरों को ही ज्यादा देखने के आदी हो चले हैं। खुद कि तरफ देखते भी नहीं है। हिटलर क़ी नैकर, टोपी यहाँ तक क़ी मुछों तक को अपनाने के बाद भी हम रूस और चीन के आश्रय क़ी बात करके खुद को ओछा करने पर क्यों तुले है? अगर वो (कम्युनिष्ट)ओछापन दिखा रहे है तो दिखाएँ। हम तो ओछे नहीं है न? हम तो सहिष्णु हैं, उदार हैं। क्या हुआ जो गुजरात में थोडा खून-खराबा कर दिया! नहीं?????

हमें हमारा हिटलर, उसकी टोपी और उसकी मूछ मुबारक। उनको उनका मार्क्स।

वैसे आप चुनाव कब लड़ रहे हैं भाई साहब? इतनी उर्जस्वित देववाणी अडवानी जी, तोगडियाजी, नरेन्द्र मोदी जी, उमा भारती जी, कटियार जी और वरुण गाँधी जी क़ी है।(कुछ महापुरुषों के नाम बांचना रह गया हो तो माफ़ी!!! ) आपकी लेखनी में भी वही धार है।वही ओज। वही तप।

निश्चित ही इससे हिंदुत्व का परचम कराची ----- कराची ही क्यों पूरे विश्व में लहराएगा। आखिर भारतमाता का भारतवर्ष विश्व-गुरु रहा है!!

भाई साहब, इतने प्रचंड हिंदुत्व को समझने और सँभालने का साहस नहीं है। कहाँ ओढूँ, कहाँ बिछाऊँ? फिर मैं ठहरा दलित! जिसे महान हिन्दू लोगों ने कभी हिन्दू होने का अहसास ही नहीं होने दिया। तो मैं समझता हूँ, समझदार को इशारा ही काफी होता है।

शेष फिर कभी।

बाकि तो जय-जय!!!!!!!!



रविवार, 5 सितंबर 2010


आती है ऐसे बिछड़े हुए दोस्तों की याद,



जैसे चराग़ जलते हैं रातों को गाँव में।

शनिवार, 4 सितंबर 2010

बीज अपने विश्वास का


मै चाहता हूँ
पढ़ना
तुम्हारी आंखों की
नीरव खामोशी को

ताकि भूल सकूँ
मोटी-मोटी किताबों तले
पिसती जा रही
अपनी आत्मा के दर्द को।
मै चाहता हूँ
स्पर्श करना
तुन्हारी प्रतीक्षारत बाँहों को
ताकि उतर आये
तुम्हारे दिल का दर्द
मेरी तहों तक
और महसूस कर सकूँ
उस मूक यंत्रणा को
जो तुमने अकेले-अकेले
वर्षों भोगी है।
मै चाहता हूँ
उस यंत्रणा से मिल सके शब्द
मेरी आहों को
मिल सके एक नया स्पंदन
मेरी सांसों को
उतर आए एक कविता
कागज़ पर।
मै चाहता हूँ
वहन कर सकूं तमाम उम्र
तुम्हारी यंत्रणा को
तुम्हारे दर्द को
और बो सकूँ
ज़िन्दगी की उर्वरा में
एक बीज अपने विश्वास का
जिसकी ज़रूरत तुम्हें
मुझसे कहीं ज्यादा है
.............


नंदकिशोर नीलम

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

सुधाजी औरत की अस्मिता के लिए "औरत की कहानी" को "ज्ञानपीठ" से वापस लेने के आपके फेसले से हिंदी-जगत के संघर्ष को ताकत मिली है उन सब लोगों के साथ आपका भी आभार जिन्होंने "ज्ञानपीठ" से अपनी पुस्तकें वापस ली हैं
क्या
वे सभी साहित्यकार भी अपनी किताबें "ज्ञानपीठ" से वापस लेने का नैतिक कदम उठाएंगे जो जन- प्रगतिशील विचार के वाहक हैं और जिनकी चिंता के केन्द्र में स्त्री के साथ-साथआज के तमाम शोषित, पीड़ित, दलित, दमित, वंचित, लांछित और अवहेलित जन और उनके मौलिक अधिकारों के लिए किया जा रहा संघर्ष है।


बुधवार, 4 अगस्त 2010

स्त्री-विमर्श बेवफाई का विराट उत्सव नहीं! रचनाधर्मिता का नवलोक है!
ये पुरुषों के रमण-लोक को ध्वस्त करने का सार्थक हथियार है।


विभूति नारायण रॉय के साक्षात्कार में जो चरित्र-हनन किया किया गया है वह साहित्य या समाज के लिए नयानहीं हैदलितों और स्त्रियों को प्रताड़ित-लांछित-उत्पीड़ित करना तो शगल है "बड़े लोगों" काचाहे "चमड़िया-प्रसंग" हो या का "ज्ञानोदय" का तथाकथित "विराट बेवफाई" प्रसंग, दलित और स्त्रियाँ अब प्रगतिशीलों की प्रगतिशीलता से बहार की चीज़ हो गया है!
पुरुष लेखकों की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आने पर चोंकने वाली कोई बात नहीं है! क्या आज भी हम पुरुषलेखक) मन से स्त्री लेखकों के "चेतावनी से चुभते व्यक्तित्व" को झेल पाए हैं? क्या हमारा दंभ अभी तक भी एकस्वतंत्र इकाई" के रूप में स्त्री को स्वीकार पाया है?
विभूति बाबु की टिपण्णी तो एक फुसफुसाहट हैवास्तविकता तो और भी भयानक है जाने कितना भरा हुआ हैये 'मर्द' भीतर से? और शायद 'डरा' हुआ भी है!
महिला आयोग की गिरिजा व्यास ने आपराधिक मामला दर्ज करने और कपिल सिब्बल ने माफ़ी मांगने की बातकही पर स्त्री लेखकों ने माफ़ी मांगने को ना काफी माना हैइतने गंदे आरोप लगा कर माफ़ी मांगना क्या स्त्रीलेखकों के विरुद्ध दूसरा बड़ा अनाचार नहीं होगा?
क्या दलित और स्त्री के खिलाफ ऐसे अपराधों की सजा सिर्फ माफ़ी है?


शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010


आलोचना के शालाखा-पुरुष: रामविलाश शर्मा


गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

मुक्तिबोध साहित्य-विमर्श

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010


आज के दौर में संवेदनहीनता बहुत गहरा गई है। किसी ने कहा है-

"कौन किसी का दर्द बांटे, सब यहाँ बीमार हैं.
पत्थरों
का शहर है, खिड़कियाँ बैकार हैं."
क्या
हम सब मिलकर इस संवेदनहीनता को तोड़ सकते हैं?

तो बताएं क्या उपाय किये जाएँ?

शनिवार, 16 जनवरी 2010