आपके जीवन में श्री, सौंदर्य, स्वास्थ्य तथा यश का
मंगल कलश सदा छलकता रहे।
वरिष्ठ कवि विजेंद्र हमारे समय की जीवंत काव्य विरासत है।
मठाधीश आलोचकों, तानाशाह संपादकों और महान कवियों के लाख नकारने के बाद भी
समय की छलनी ने यह साबित कर दिया है कि...वे हमारे जटिल समय के बहुत जरुरी कवि हैं।
समकालीन लोककविता (और लम्बी कविता) में चरित्र को लेकर उन्होंने जो प्रयोग किये हैं वे दुर्लभ हैं।
राजस्थान ही नहीं, पूरे हिंदी साहित्य को उन पर गर्व होना चाहिए।
मैं जनता हूँ राजस्थान में उनके साथ कितना औछा बर्ताव किया जाता रहा है।
उन पर शोध कार्य करवाने के लिए मुझे कितना संघर्ष विश्वविध्यालय के महान अध्यापकों से करना पड़ा था।
उनके अनुसार विजेंद्र की कविता पी-एच डी के योग्य ही नहीं थी।
ये बात वे लोग कह रहे थे जिनकी खुद की थीसिस प्रमाणिक रूप से आपत्तिजनक थी।
बहरहाल विजेंद्रजी पर अब एक नहीं लगभग दस जगह पी-एच डी हो रही है।
राजस्थान मैं यह शुरुआत मेरे संघर्ष से मेरे निर्देशन मैं हुई है। देर से ही सही शुरुआत तो हुई है।
"घर का जोगी जोगना, आन गाँव का सिद्ध" ज्यादा दिन तक सही नहीं रह सकता।
अब जड़ताएँ तोड़ने का समय है, और तोड़ी भी जा रही है.....
किन्ही अनिल सोमित्र ( हिन्दुत्ववादी ) का फ्रेंड रिक्वेस्ट मेरे पास आया था। उनका "प्रोफाइल वाल" देख-पढ़कर जो जवाब उनके लिए मुझसे बन पाया वह आप सभी साथियों के अवलोकनार्थ पेश है।
उन्होंने कम्युनिष्टों के लिए लिखा है_
"कांग्रेसी कूडे पर ही कम्युनिस्टी कीडे पलते है. कम्युनिस्ट नेता हो या बौद्धिक हमेशा राज्याश्रय कीतलाश मे ही रहता है. कभी अंग्रेजो के साथ, तो कभी कांग्रेसियो के साथ. रुस और चीन के आश्रय को तो वेअपना अधिकार ही मनते है, संघी-भाजपाई राज्याश्रय से भी उन्हे परहेज नही. आजादी से पहले औरउसके बाद अनेक उदाहरण है।"
उन्होंने फिर लिखा____
सोनिया जी के नेतृत्व मे कांग्रेस के नेता - दिग्विजय सिह जी और चिदम्बरम जी "आतंकवाद कारंग-रोगन" कर रहे है, इस्लामी आतंक (हरा), माओवादी आतंक (लाल), सिख आतंक (.......) के बादअब " हिन्दू आतंक (भगवा)" की बात की गई है.. आप भी कुछ कहना चाहेंगे.....!
मैंने उनको लिखा है_____
भाई साहब, आपके सारे विचार, ----- नहीं-नहीं विचार नहीं! विचार तो कमबख्त कोम्युनिष्टों क़ी चीज है। आपके पवित्र वि ------ क्या कहूँ! !!!!!!!!! पवित्र-वचन। ओजस्वी-उद्बोधन। पढ़कर मन में विचार आता है कि जब कुछ कट्टर मुसलमानों के आतंक फ़ैलाने से सारी मुस्लिम कौम आतंकी हो सकती है तो फिर कुछ कट्टर हिन्दुओं के आतंक फ़ैलाने से "भगवा आतंकवाद" क्यों नहीं हो सकता। इतना पचाने का साहस तो हम हिन्दुओं में होना ही चाहिए!
मुस्लिम-आतंकवाद कहकर हम गर्व कर सकते हैं तो हिन्दू या भगवा आतंकवाद सुनकर गौरव करना भी हमें आना चाहिए न भाई साहब??
राज्याश्रय कम्युनिष्टों को कभी प्रिय रहा हो तो रहे। हम तथाकथित गैर कम्युनिष्ट हिन्दुओं को तो उनके पद्चीन्हों पर नहीं चलना चाहिए। न जाने क्यों हम दूसरों को ही ज्यादा देखने के आदी हो चले हैं। खुद कि तरफ देखते भी नहीं है। हिटलर क़ी नैकर, टोपी यहाँ तक क़ी मुछों तक को अपनाने के बाद भी हम रूस और चीन के आश्रय क़ी बात करके खुद को ओछा करने पर क्यों तुले है? अगर वो (कम्युनिष्ट)ओछापन दिखा रहे है तो दिखाएँ। हम तो ओछे नहीं है न? हम तो सहिष्णु हैं, उदार हैं। क्या हुआ जो गुजरात में थोडा खून-खराबा कर दिया! नहीं?????
हमें हमारा हिटलर, उसकी टोपी और उसकी मूछ मुबारक। उनको उनका मार्क्स।
वैसे आप चुनाव कब लड़ रहे हैं भाई साहब? इतनी उर्जस्वित देववाणी अडवानी जी, तोगडियाजी, नरेन्द्र मोदी जी, उमा भारती जी, कटियार जी और वरुण गाँधी जी क़ी है।(कुछ महापुरुषों के नाम बांचना रह गया हो तो माफ़ी!!! ) आपकी लेखनी में भी वही धार है।वही ओज। वही तप।
निश्चित ही इससे हिंदुत्व का परचम कराची ----- कराची ही क्यों पूरे विश्व में लहराएगा। आखिर भारतमाता का भारतवर्ष विश्व-गुरु रहा है!!
भाई साहब, इतने प्रचंड हिंदुत्व को समझने और सँभालने का साहस नहीं है। कहाँ ओढूँ, कहाँ बिछाऊँ? फिर मैं ठहरा दलित! जिसे महान हिन्दू लोगों ने कभी हिन्दू होने का अहसास ही नहीं होने दिया। तो मैं समझता हूँ, समझदार को इशारा ही काफी होता है।
शेष फिर कभी।
बाकि तो जय-जय!!!!!!!!
मै चाहता हूँ
पढ़ना
तुम्हारी आंखों की
नीरव खामोशी को
ताकि भूल सकूँ
मोटी-मोटी किताबों तले
पिसती जा रही
अपनी आत्मा के दर्द को।
मै चाहता हूँ
स्पर्श करना
तुन्हारी प्रतीक्षारत बाँहों को
ताकि उतर आये
तुम्हारे दिल का दर्द
मेरी तहों तक
और महसूस कर सकूँ
उस मूक यंत्रणा को
जो तुमने अकेले-अकेले
वर्षों भोगी है।
मै चाहता हूँ
उस यंत्रणा से मिल सके शब्द
मेरी आहों को
मिल सके एक नया स्पंदन
मेरी सांसों को
उतर आए एक कविता
कागज़ पर।
मै चाहता हूँ
वहन कर सकूं तमाम उम्र
तुम्हारी यंत्रणा को
तुम्हारे दर्द को
और बो सकूँ
ज़िन्दगी की उर्वरा में
एक बीज अपने विश्वास का
जिसकी ज़रूरत तुम्हें
मुझसे कहीं ज्यादा है .............
नंदकिशोर नीलम