शनिवार, 4 सितंबर 2010

बीज अपने विश्वास का


मै चाहता हूँ
पढ़ना
तुम्हारी आंखों की
नीरव खामोशी को

ताकि भूल सकूँ
मोटी-मोटी किताबों तले
पिसती जा रही
अपनी आत्मा के दर्द को।
मै चाहता हूँ
स्पर्श करना
तुन्हारी प्रतीक्षारत बाँहों को
ताकि उतर आये
तुम्हारे दिल का दर्द
मेरी तहों तक
और महसूस कर सकूँ
उस मूक यंत्रणा को
जो तुमने अकेले-अकेले
वर्षों भोगी है।
मै चाहता हूँ
उस यंत्रणा से मिल सके शब्द
मेरी आहों को
मिल सके एक नया स्पंदन
मेरी सांसों को
उतर आए एक कविता
कागज़ पर।
मै चाहता हूँ
वहन कर सकूं तमाम उम्र
तुम्हारी यंत्रणा को
तुम्हारे दर्द को
और बो सकूँ
ज़िन्दगी की उर्वरा में
एक बीज अपने विश्वास का
जिसकी ज़रूरत तुम्हें
मुझसे कहीं ज्यादा है
.............


नंदकिशोर नीलम

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