समालोचक
रविवार, 26 सितंबर 2010
किसी
समय
लिखी
मेरी
कुछ
पंक्तियाँ
.......
"
तेरे
लिए
भी
कोई
राय
बनी
है
कहीं
,
तेरे
हक़
में
भी
कोई
मुट्ठी
तनी
है
कहीं
।
राख
के
ढेर
पर
बैठ
कर
अफ़सोस
न
कर
,
हो
सकता
है
कोई
चिंगारी
दबी
हो
कहीं
।
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