किन्ही अनिल सोमित्र ( हिन्दुत्ववादी ) का फ्रेंड रिक्वेस्ट मेरे पास आया था। उनका "प्रोफाइल वाल" देख-पढ़कर जो जवाब उनके लिए मुझसे बन पाया वह आप सभी साथियों के अवलोकनार्थ पेश है।
उन्होंने कम्युनिष्टों के लिए लिखा है_
"कांग्रेसी कूडे पर ही कम्युनिस्टी कीडे पलते है. कम्युनिस्ट नेता हो या बौद्धिक हमेशा राज्याश्रय कीतलाश मे ही रहता है. कभी अंग्रेजो के साथ, तो कभी कांग्रेसियो के साथ. रुस और चीन के आश्रय को तो वेअपना अधिकार ही मनते है, संघी-भाजपाई राज्याश्रय से भी उन्हे परहेज नही. आजादी से पहले औरउसके बाद अनेक उदाहरण है।"
उन्होंने फिर लिखा____
सोनिया जी के नेतृत्व मे कांग्रेस के नेता - दिग्विजय सिह जी और चिदम्बरम जी "आतंकवाद कारंग-रोगन" कर रहे है, इस्लामी आतंक (हरा), माओवादी आतंक (लाल), सिख आतंक (.......) के बादअब " हिन्दू आतंक (भगवा)" की बात की गई है.. आप भी कुछ कहना चाहेंगे.....!
मैंने उनको लिखा है_____
भाई साहब, आपके सारे विचार, ----- नहीं-नहीं विचार नहीं! विचार तो कमबख्त कोम्युनिष्टों क़ी चीज है। आपके पवित्र वि ------ क्या कहूँ! !!!!!!!!! पवित्र-वचन। ओजस्वी-उद्बोधन। पढ़कर मन में विचार आता है कि जब कुछ कट्टर मुसलमानों के आतंक फ़ैलाने से सारी मुस्लिम कौम आतंकी हो सकती है तो फिर कुछ कट्टर हिन्दुओं के आतंक फ़ैलाने से "भगवा आतंकवाद" क्यों नहीं हो सकता। इतना पचाने का साहस तो हम हिन्दुओं में होना ही चाहिए!
मुस्लिम-आतंकवाद कहकर हम गर्व कर सकते हैं तो हिन्दू या भगवा आतंकवाद सुनकर गौरव करना भी हमें आना चाहिए न भाई साहब??
राज्याश्रय कम्युनिष्टों को कभी प्रिय रहा हो तो रहे। हम तथाकथित गैर कम्युनिष्ट हिन्दुओं को तो उनके पद्चीन्हों पर नहीं चलना चाहिए। न जाने क्यों हम दूसरों को ही ज्यादा देखने के आदी हो चले हैं। खुद कि तरफ देखते भी नहीं है। हिटलर क़ी नैकर, टोपी यहाँ तक क़ी मुछों तक को अपनाने के बाद भी हम रूस और चीन के आश्रय क़ी बात करके खुद को ओछा करने पर क्यों तुले है? अगर वो (कम्युनिष्ट)ओछापन दिखा रहे है तो दिखाएँ। हम तो ओछे नहीं है न? हम तो सहिष्णु हैं, उदार हैं। क्या हुआ जो गुजरात में थोडा खून-खराबा कर दिया! नहीं?????
हमें हमारा हिटलर, उसकी टोपी और उसकी मूछ मुबारक। उनको उनका मार्क्स।
वैसे आप चुनाव कब लड़ रहे हैं भाई साहब? इतनी उर्जस्वित देववाणी अडवानी जी, तोगडियाजी, नरेन्द्र मोदी जी, उमा भारती जी, कटियार जी और वरुण गाँधी जी क़ी है।(कुछ महापुरुषों के नाम बांचना रह गया हो तो माफ़ी!!! ) आपकी लेखनी में भी वही धार है।वही ओज। वही तप।
निश्चित ही इससे हिंदुत्व का परचम कराची ----- कराची ही क्यों पूरे विश्व में लहराएगा। आखिर भारतमाता का भारतवर्ष विश्व-गुरु रहा है!!
भाई साहब, इतने प्रचंड हिंदुत्व को समझने और सँभालने का साहस नहीं है। कहाँ ओढूँ, कहाँ बिछाऊँ? फिर मैं ठहरा दलित! जिसे महान हिन्दू लोगों ने कभी हिन्दू होने का अहसास ही नहीं होने दिया। तो मैं समझता हूँ, समझदार को इशारा ही काफी होता है।
शेष फिर कभी।
बाकि तो जय-जय!!!!!!!!
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