स्त्री-विमर्श बेवफाई का विराट उत्सव नहीं! रचनाधर्मिता का नवलोक है!
ये पुरुषों के रमण-लोक को ध्वस्त करने का सार्थक हथियार है।
विभूति नारायण रॉय के साक्षात्कार में जो चरित्र-हनन किया किया गया है वह साहित्य या समाज के लिए नयानहीं है। दलितों और स्त्रियों को प्रताड़ित-लांछित-उत्पीड़ित करना तो शगल है "बड़े लोगों" का। चाहे "चमड़िया-प्रसंग" हो या का "ज्ञानोदय" का तथाकथित "विराट बेवफाई" प्रसंग, दलित और स्त्रियाँ अब विभूति बाबु जैसे तथाकथित प्रगतिशीलों की छद्म प्रगतिशीलता से बहार की चीज़ हो गया है!
कुछ नामी-गिरामी पुरुष लेखकों की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आने पर या उनके द्वारा विभूतिनारायण राय के पक्ष में गाली देने पर चोंकने वाली कोई बात नहीं है! क्या आज भी हम (पुरुषलेखक) मन से स्त्री लेखकों के "चेतावनी से चुभते व्यक्तित्व" को झेल पाए हैं? क्या हमारा दंभ अभी तक भी एक स्वतंत्र इकाई" के रूप में स्त्री को स्वीकार पाया है?
विभूति बाबु की टिपण्णी तो एक फुसफुसाहट है। वास्तविकता तो और भी भयानक है। न जाने कितना भरा हुआ है ये 'मर्द' भीतर से? और शायद 'डरा' हुआ भी है!
सितम्बर २०१० के "हंस" के सम्पादकीय ने भी बड़ा दुःख दिया। राजेंद्र जी ऐसा लिखेंगे, विश्वास नहीं हुआ!
महिला आयोग की गिरिजा व्यास ने आपराधिक मामला दर्ज करने और कपिल सिब्बल ने माफ़ी मांगने की बातकही पर स्त्री लेखकों ने माफ़ी मांगने को ना काफी माना है। इतने गंदे आरोप लगा कर माफ़ी मांगना क्या स्त्री लेखकों के विरुद्ध दूसरा बड़ा अनाचार नहीं होगा?
क्या दलित और स्त्री के खिलाफ ऐसे अपराधों की सजा सिर्फ माफ़ी है?
जिन साहित्यकारों ने ज्ञानपीठ से अपनी पुस्तकें वापस लेकर असहयोग की बात की है, उनका आभार!
क्या वे सभी साहित्यकार भी अपनी किताबें "ज्ञानपीठ" से वापस लेने का नैतिक कदम उठाएंगे जो जन- प्रगतिशील विचार के वाहक हैं और जिनकी चिंता के केन्द्र में स्त्री के साथ-साथआज के तमाम शोषित, पीड़ित, दलित, दमित, वंचित, लांछित और अवहेलित जन और उनके मौलिक अधिकारों के लिए किया जा रहा संघर्ष है।
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