गुरुवार, 2 सितंबर 2010

सुधाजी औरत की अस्मिता के लिए "औरत की कहानी" को "ज्ञानपीठ" से वापस लेने के आपके फेसले से हिंदी-जगत के संघर्ष को ताकत मिली है उन सब लोगों के साथ आपका भी आभार जिन्होंने "ज्ञानपीठ" से अपनी पुस्तकें वापस ली हैं
क्या
वे सभी साहित्यकार भी अपनी किताबें "ज्ञानपीठ" से वापस लेने का नैतिक कदम उठाएंगे जो जन- प्रगतिशील विचार के वाहक हैं और जिनकी चिंता के केन्द्र में स्त्री के साथ-साथआज के तमाम शोषित, पीड़ित, दलित, दमित, वंचित, लांछित और अवहेलित जन और उनके मौलिक अधिकारों के लिए किया जा रहा संघर्ष है।


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