वरिष्ठ कवि विजेंद्र हमारे समय की जीवंत काव्य विरासत है।
मठाधीश आलोचकों, तानाशाह संपादकों और महान कवियों के लाख नकारने के बाद भी
समय की छलनी ने यह साबित कर दिया है कि...वे हमारे जटिल समय के बहुत जरुरी कवि हैं।
समकालीन लोककविता (और लम्बी कविता) में चरित्र को लेकर उन्होंने जो प्रयोग किये हैं वे दुर्लभ हैं।
राजस्थान ही नहीं, पूरे हिंदी साहित्य को उन पर गर्व होना चाहिए।
मैं जनता हूँ राजस्थान में उनके साथ कितना औछा बर्ताव किया जाता रहा है।
उन पर शोध कार्य करवाने के लिए मुझे कितना संघर्ष विश्वविध्यालय के महान अध्यापकों से करना पड़ा था।
उनके अनुसार विजेंद्र की कविता पी-एच डी के योग्य ही नहीं थी।
ये बात वे लोग कह रहे थे जिनकी खुद की थीसिस प्रमाणिक रूप से आपत्तिजनक थी।
बहरहाल विजेंद्रजी पर अब एक नहीं लगभग दस जगह पी-एच डी हो रही है।
राजस्थान मैं यह शुरुआत मेरे संघर्ष से मेरे निर्देशन मैं हुई है। देर से ही सही शुरुआत तो हुई है।
"घर का जोगी जोगना, आन गाँव का सिद्ध" ज्यादा दिन तक सही नहीं रह सकता।
अब जड़ताएँ तोड़ने का समय है, और तोड़ी भी जा रही है.....
यद्यपि विजेंद्रजी हिंदी-साहित्य में कोई अपरिचित नाम नहीं है। इसके बावजूद विश्वविद्यालय के ’महान’ शिक्षकों ने उन्हें शोध के अयोग्य माना, ताज्जुब और शर्म, दोनों की बात है। सर, आपने लड़कर विजेन्द्रजी को उनका दाय दिलवाया। बधाई।
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