रविवार, 26 सितंबर 2010
मंगलवार, 14 सितंबर 2010
हमारे माता-पिता बताते हैं की उस समय कैसे मुसलमानों ने हिन्दुओं को अपने घरों में पनाह दी, उनकी जान और इज्जत की हिफाजत की। भारत में हिन्दुओं ने भी यही किया।
वो कमीने दहशत-गर्द तो कोई और ही थे जो दोनों कौमों में छिपे बेठे थे। और बेगुनाह मासूमों का खून बहा रहे थे।
आपतो किराये का हिंदुत्व और उसकी पीड़ा लेकर लड़ने को तैयार रहतें हैं। हम तो भुक्त भोगी हैं, हम जानते हैं सचाई क्या है।
इस लिए मासूमों को बरगलाना छोडिये, सत्ता की भूख त्यागिये और इस देश को खुली साँसें लेकर बढ़ने-विकसित होने दीजिये. हवाओं में जहर घोलने की कोशिस मत कीजिये।
बस एक बात और---- लोग अब समझने लगे हैं कि किसकी क्या मंसा है. इस लिए सब लोगों के विवेक पर छोड़ दीजिये. वे भी अन्न खाते हैं भाई साहब. और जानते है कि सच क्या है.
मैं समजता हूँ कि अब इस विषय में संवाद कि और जरुरत नहीं है.
शुक्रवार, 10 सितंबर 2010
भगवा आतंकवाद के बरक्श बाबा नागार्जुन!
अपनी "शपथ" कविता में बाबा ने लिखा है-
"कांटे कहाँ, रोड़े हैं
कहाँ गढ़ा है, कहाँ रेत है
सभी साफ हो गया आज, जनता सचेत है
कोटि-कोटि कंठों से निसृत सुन-सुनकर आक्रोश
भगवाध्वजधारी दैत्यों के उड़े जा रहे होश।"
गुरुवार, 9 सितंबर 2010
स्त्री-विमर्श बेवफाई का विराट उत्सव नहीं! रचनाधर्मिता का नवलोक है!
ये पुरुषों के रमण-लोक को ध्वस्त करने का सार्थक हथियार है।
विभूति नारायण रॉय के साक्षात्कार में जो चरित्र-हनन किया किया गया है वह साहित्य या समाज के लिए नयानहीं है। दलितों और स्त्रियों को प्रताड़ित-लांछित-उत्पीड़ित करना तो शगल है "बड़े लोगों" का। चाहे "चमड़िया-प्रसंग" हो या का "ज्ञानोदय" का तथाकथित "विराट बेवफाई" प्रसंग, दलित और स्त्रियाँ अब विभूति बाबु जैसे तथाकथित प्रगतिशीलों की छद्म प्रगतिशीलता से बहार की चीज़ हो गया है!
कुछ नामी-गिरामी पुरुष लेखकों की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आने पर या उनके द्वारा विभूतिनारायण राय के पक्ष में गाली देने पर चोंकने वाली कोई बात नहीं है! क्या आज भी हम (पुरुषलेखक) मन से स्त्री लेखकों के "चेतावनी से चुभते व्यक्तित्व" को झेल पाए हैं? क्या हमारा दंभ अभी तक भी एक स्वतंत्र इकाई" के रूप में स्त्री को स्वीकार पाया है?
विभूति बाबु की टिपण्णी तो एक फुसफुसाहट है। वास्तविकता तो और भी भयानक है। न जाने कितना भरा हुआ है ये 'मर्द' भीतर से? और शायद 'डरा' हुआ भी है!
सितम्बर २०१० के "हंस" के सम्पादकीय ने भी बड़ा दुःख दिया। राजेंद्र जी ऐसा लिखेंगे, विश्वास नहीं हुआ!
महिला आयोग की गिरिजा व्यास ने आपराधिक मामला दर्ज करने और कपिल सिब्बल ने माफ़ी मांगने की बातकही पर स्त्री लेखकों ने माफ़ी मांगने को ना काफी माना है। इतने गंदे आरोप लगा कर माफ़ी मांगना क्या स्त्री लेखकों के विरुद्ध दूसरा बड़ा अनाचार नहीं होगा?
क्या दलित और स्त्री के खिलाफ ऐसे अपराधों की सजा सिर्फ माफ़ी है?
जिन साहित्यकारों ने ज्ञानपीठ से अपनी पुस्तकें वापस लेकर असहयोग की बात की है, उनका आभार!
क्या वे सभी साहित्यकार भी अपनी किताबें "ज्ञानपीठ" से वापस लेने का नैतिक कदम उठाएंगे जो जन- प्रगतिशील विचार के वाहक हैं और जिनकी चिंता के केन्द्र में स्त्री के साथ-साथआज के तमाम शोषित, पीड़ित, दलित, दमित, वंचित, लांछित और अवहेलित जन और उनके मौलिक अधिकारों के लिए किया जा रहा संघर्ष है।
सोमवार, 6 सितंबर 2010
विचार
किन्ही अनिल सोमित्र ( हिन्दुत्ववादी ) का फ्रेंड रिक्वेस्ट मेरे पास आया था। उनका "प्रोफाइल वाल" देख-पढ़कर जो जवाब उनके लिए मुझसे बन पाया वह आप सभी साथियों के अवलोकनार्थ पेश है।
उन्होंने कम्युनिष्टों के लिए लिखा है_
"कांग्रेसी कूडे पर ही कम्युनिस्टी कीडे पलते है. कम्युनिस्ट नेता हो या बौद्धिक हमेशा राज्याश्रय कीतलाश मे ही रहता है. कभी अंग्रेजो के साथ, तो कभी कांग्रेसियो के साथ. रुस और चीन के आश्रय को तो वेअपना अधिकार ही मनते है, संघी-भाजपाई राज्याश्रय से भी उन्हे परहेज नही. आजादी से पहले औरउसके बाद अनेक उदाहरण है।"
उन्होंने फिर लिखा____
सोनिया जी के नेतृत्व मे कांग्रेस के नेता - दिग्विजय सिह जी और चिदम्बरम जी "आतंकवाद कारंग-रोगन" कर रहे है, इस्लामी आतंक (हरा), माओवादी आतंक (लाल), सिख आतंक (.......) के बादअब " हिन्दू आतंक (भगवा)" की बात की गई है.. आप भी कुछ कहना चाहेंगे.....!
मैंने उनको लिखा है_____
भाई साहब, आपके सारे विचार, ----- नहीं-नहीं विचार नहीं! विचार तो कमबख्त कोम्युनिष्टों क़ी चीज है। आपके पवित्र वि ------ क्या कहूँ! !!!!!!!!! पवित्र-वचन। ओजस्वी-उद्बोधन। पढ़कर मन में विचार आता है कि जब कुछ कट्टर मुसलमानों के आतंक फ़ैलाने से सारी मुस्लिम कौम आतंकी हो सकती है तो फिर कुछ कट्टर हिन्दुओं के आतंक फ़ैलाने से "भगवा आतंकवाद" क्यों नहीं हो सकता। इतना पचाने का साहस तो हम हिन्दुओं में होना ही चाहिए!
मुस्लिम-आतंकवाद कहकर हम गर्व कर सकते हैं तो हिन्दू या भगवा आतंकवाद सुनकर गौरव करना भी हमें आना चाहिए न भाई साहब??
राज्याश्रय कम्युनिष्टों को कभी प्रिय रहा हो तो रहे। हम तथाकथित गैर कम्युनिष्ट हिन्दुओं को तो उनके पद्चीन्हों पर नहीं चलना चाहिए। न जाने क्यों हम दूसरों को ही ज्यादा देखने के आदी हो चले हैं। खुद कि तरफ देखते भी नहीं है। हिटलर क़ी नैकर, टोपी यहाँ तक क़ी मुछों तक को अपनाने के बाद भी हम रूस और चीन के आश्रय क़ी बात करके खुद को ओछा करने पर क्यों तुले है? अगर वो (कम्युनिष्ट)ओछापन दिखा रहे है तो दिखाएँ। हम तो ओछे नहीं है न? हम तो सहिष्णु हैं, उदार हैं। क्या हुआ जो गुजरात में थोडा खून-खराबा कर दिया! नहीं?????
हमें हमारा हिटलर, उसकी टोपी और उसकी मूछ मुबारक। उनको उनका मार्क्स।
वैसे आप चुनाव कब लड़ रहे हैं भाई साहब? इतनी उर्जस्वित देववाणी अडवानी जी, तोगडियाजी, नरेन्द्र मोदी जी, उमा भारती जी, कटियार जी और वरुण गाँधी जी क़ी है।(कुछ महापुरुषों के नाम बांचना रह गया हो तो माफ़ी!!! ) आपकी लेखनी में भी वही धार है।वही ओज। वही तप।
निश्चित ही इससे हिंदुत्व का परचम कराची ----- कराची ही क्यों पूरे विश्व में लहराएगा। आखिर भारतमाता का भारतवर्ष विश्व-गुरु रहा है!!
भाई साहब, इतने प्रचंड हिंदुत्व को समझने और सँभालने का साहस नहीं है। कहाँ ओढूँ, कहाँ बिछाऊँ? फिर मैं ठहरा दलित! जिसे महान हिन्दू लोगों ने कभी हिन्दू होने का अहसास ही नहीं होने दिया। तो मैं समझता हूँ, समझदार को इशारा ही काफी होता है।
शेष फिर कभी।
बाकि तो जय-जय!!!!!!!!
शनिवार, 4 सितंबर 2010
बीज अपने विश्वास का
मै चाहता हूँ
पढ़ना
तुम्हारी आंखों की
नीरव खामोशी को
ताकि भूल सकूँ
मोटी-मोटी किताबों तले
पिसती जा रही
अपनी आत्मा के दर्द को।
मै चाहता हूँ
स्पर्श करना
तुन्हारी प्रतीक्षारत बाँहों को
ताकि उतर आये
तुम्हारे दिल का दर्द
मेरी तहों तक
और महसूस कर सकूँ
उस मूक यंत्रणा को
जो तुमने अकेले-अकेले
वर्षों भोगी है।
मै चाहता हूँ
उस यंत्रणा से मिल सके शब्द
मेरी आहों को
मिल सके एक नया स्पंदन
मेरी सांसों को
उतर आए एक कविता
कागज़ पर।
मै चाहता हूँ
वहन कर सकूं तमाम उम्र
तुम्हारी यंत्रणा को
तुम्हारे दर्द को
और बो सकूँ
ज़िन्दगी की उर्वरा में
एक बीज अपने विश्वास का
जिसकी ज़रूरत तुम्हें
मुझसे कहीं ज्यादा है .............
नंदकिशोर नीलम
गुरुवार, 2 सितंबर 2010
क्या वे सभी साहित्यकार भी अपनी किताबें "ज्ञानपीठ" से वापस लेने का नैतिक कदम उठाएंगे जो जन- प्रगतिशील विचार के वाहक हैं और जिनकी चिंता के केन्द्र में स्त्री के साथ-साथआज के तमाम शोषित, पीड़ित, दलित, दमित, वंचित, लांछित और अवहेलित जन और उनके मौलिक अधिकारों के लिए किया जा रहा संघर्ष है।
