भगत सिंह के प्रति सच्ची श्रधांजलि तब होगी जब हम, ५-६ अक्तूबर १९३० को लिखी उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण रचना - "मैं नास्तिक क्यों हूँ?" को अपने जीवन में उतारेंगे। बाकि तो खानापूर्ति या बस हायतौबा मचाना ही होगा। हमें याद रखना चाहिए कि भगत सिंह ने रूढ़ियों, पाखंडों और कर्मकांडों को तोडा था। उन्होंने सिख होकर भी अपने केश कटवा कर आडम्बर को तोडा था। मुझे गर्व है खुद पर कि मैं नास्तिक हूँ।
भगत सिंह ने (ईस्वर्वादियों) आस्तिक लोगों से पूछा था -
"जैसा कि आपका विश्वास है, एक सर्व शक्तिमान, सर्व व्यापक एवं सर्व ज्ञानी ईश्वर है जिसने कि पृथ्वी या विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बताएं कि उसने यह रचना क्यों की? कष्टों और आफतों से भरी यह दुनिया- असंख्य दुखों के शाश्वत और अनंत गठबन्धनों से ग्रसित! एक भी प्राणी पूरी तरह सुखी नहीं!"
-"मैं नास्तिक क्यों हूँ?"
साथियों,
आज शहीदे-आजम भगत सिंह की रचना "मैं नास्तिक क्यों हूँ?"
फिर से पढ़ी। सेंकडों बार पढ़ा है इसे।
इसे पढ़ कर यह संतोष है कि मैं नास्तिक हूँ। मुझे खुद के नास्तिक होने पर गर्व है।
जिस ईश्वर को सारी दुनिया में शोषण और अनाचार के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया,
उसके अस्तित्व के नकार से मुझे बल मिलाता है।
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