कविता-
दूरदराज गाँव के बच्चे
अभ्यस्त हैं
अपनी भेड़-बकरियां चराने के
मुंह-अँधेरे
उठा देती है माँ
गाय-भेंसों का
गोबर थापने के लिए
और चलता कर देती है
दिन चढ़ते ही कांकड़ में
प्याज और रोटी देकर
भेड़-बकरियों के साथ......
खुले आकाश के नीचे
काँटों की बाड़ में
चल रही पाठशाला के
पास से गुजरते हुए
वे झांकते हैं पलभर को
पाठशाला के भीतर, और
'दो दूनी चार' की रट में
रेवड़ से बिछुड़ गई
अपनी बकरी को
बुलाने की टेर मिलाते हुए
दौड़ जाते हैं उसकी ओर!
वे अभ्यस्त हैं
रोज ही पाठशाला को
अपने से पीछे छोड़ जाने के!
.................................................................
बहुत ही सुन्दर रचना . बधाई
जवाब देंहटाएं