रविवार, 24 अक्टूबर 2010

अनिल गंगल की कविता:- "करवा-चौथ का व्रत रखती एक औरत"



अहंकार से तनी रीढ़ का सामना करती
एक मार खाई औरत रखती है करवा-चौथ का व्रत
लाल आँखों और तनी हुई मूछों के अन्धकार में
एक गाली खाती औरत करती है करवा....
कहीं किसी भी खली जगह में जैसे-तैसे अंटती
अपनी सही-सही जगह खोज पाई एक अपमानित औरत
रखती है करवा...

जोड़-जोड़ टूटती पोर-पोर थकी
जनम-जनम से भूखी रही आई एक औरत
तीन वक्त के खाने से अघाए एक भरे पेट वाले पुरुष के लिए
रखती है व्रत...

व्रत करती औरत
निर्जला रह चाँद के दिखने की प्रतीक्षा करती है

दुर्दिनों से गुजरती औरत विश्वाश करती है
कि विश्वाश के सहारे फतह किये जा सकते हैं किले
और तीनों भुवन
हांफती-कराहती औरत करती है विश्वाश
कि सिर्फ वही है जिसके व्रत से नहीं मंडरायेंगी दुरात्मएं
उसके सुहाग के आस-पास भी
व्रत रखती एक औरत यम के हाथों से
एक पुरुष को छुड़ा लाने का रचती है मिथक
और खुद एक गाथा में बदल जाती है

सारा-सारा दिन निर्जला रहने के बावजूद
सुर्खरू आँखों की ललामी नहीं होती कम
तनी हुई मूछों का कसाव जरा भी नहीं पड़ता ढीला
सदियों से अकड़ आई रीढ़ झुकाती नहीं जरा भी
सहस्त्र पीढ़ियों के अपमान के ठूंठ से
उगती नहीं एक भी हरी कोंपल

सिर्फ उस रात ही नहीं
ताउम्र दिखता नहीं औरत को चाँद

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

विजेन्द्रजी हमारे समय की जीवंत काव्य विरासत है



वरिष्ठ कवि विजेंद्र हमारे समय की जीवंत काव्य विरासत है।

मठाधीश आलोचकों, तानाशाह संपादकों और महान कवियों के लाख नकारने के बाद भी

समय की छलनी ने यह साबित कर दिया है कि...वे हमारे जटिल समय के बहुत जरुरी कवि हैं।

समकालीन लोककविता (और लम्बी कविता) में चरित्र को लेकर उन्होंने जो प्रयोग किये हैं वे दुर्लभ हैं।

राजस्थान ही नहीं, पूरे हिंदी साहित्य को उन पर गर्व होना चाहिए।

मैं जनता हूँ राजस्थान में उनके साथ कितना औछा बर्ताव किया जाता रहा है।

उन पर शोध कार्य करवाने के लिए मुझे कितना संघर्ष विश्वविध्यालय के महान अध्यापकों से करना पड़ा था।

उनके अनुसार विजेंद्र की कविता पी-एच डी के योग्य ही नहीं थी।

ये बात वे लोग कह रहे थे जिनकी खुद की थीसिस प्रमाणिक रूप से आपत्तिजनक थी।

बहरहाल विजेंद्रजी पर अब एक नहीं लगभग दस जगह पी-एच डी हो रही है।

राजस्थान मैं यह शुरुआत मेरे संघर्ष से मेरे निर्देशन मैं हुई है। देर से ही सही शुरुआत तो हुई है।

"घर का जोगी जोगना, आन गाँव का सिद्ध" ज्यादा दिन तक सही नहीं रह सकता।

अब जड़ताएँ तोड़ने का समय है, और तोड़ी भी जा रही है.....

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

गाँव के बच्चे

कविता-

दूरदराज गाँव के बच्चे
अभ्यस्त हैं
अपनी भेड़-बकरियां चराने के
मुंह-अँधेरे
उठा देती है माँ
गाय-भेंसों का
गोबर थापने के लिए
और चलता कर देती है
दिन चढ़ते ही कांकड़ में
प्याज और रोटी देकर
भेड़-बकरियों के साथ......

खुले आकाश के नीचे
काँटों की बाड़ में
चल रही पाठशाला के
पास से गुजरते हुए
वे झांकते हैं पलभर को
पाठशाला के भीतर, और
'
दो दूनी चार' की रट में
रेवड़ से बिछुड़ गई
अपनी बकरी को
बुलाने की टेर मिलाते हुए
दौड़ जाते हैं उसकी ओर!
वे अभ्यस्त हैं
रोज ही पाठशाला को
अपने से पीछे छोड़ जाने के!
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सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

कई ऐसा तो नहीं प्रभातजी
कि बाज़ार ने पिता को भी out dated commodity में बदल दिया हो.......

मेरी एक छोटीसी कविता है----




रविवार, 3 अक्टूबर 2010




कई ऐसा तो नहीं प्रभातजी
कि बाज़ार ने पिता को भी out dated commodity में बदल दिया हो.......

मेरी एक छोटीसी कविता है----