बुधवार, 4 अगस्त 2010

स्त्री-विमर्श बेवफाई का विराट उत्सव नहीं! रचनाधर्मिता का नवलोक है!
ये पुरुषों के रमण-लोक को ध्वस्त करने का सार्थक हथियार है।


विभूति नारायण रॉय के साक्षात्कार में जो चरित्र-हनन किया किया गया है वह साहित्य या समाज के लिए नयानहीं हैदलितों और स्त्रियों को प्रताड़ित-लांछित-उत्पीड़ित करना तो शगल है "बड़े लोगों" काचाहे "चमड़िया-प्रसंग" हो या का "ज्ञानोदय" का तथाकथित "विराट बेवफाई" प्रसंग, दलित और स्त्रियाँ अब प्रगतिशीलों की प्रगतिशीलता से बहार की चीज़ हो गया है!
पुरुष लेखकों की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आने पर चोंकने वाली कोई बात नहीं है! क्या आज भी हम पुरुषलेखक) मन से स्त्री लेखकों के "चेतावनी से चुभते व्यक्तित्व" को झेल पाए हैं? क्या हमारा दंभ अभी तक भी एकस्वतंत्र इकाई" के रूप में स्त्री को स्वीकार पाया है?
विभूति बाबु की टिपण्णी तो एक फुसफुसाहट हैवास्तविकता तो और भी भयानक है जाने कितना भरा हुआ हैये 'मर्द' भीतर से? और शायद 'डरा' हुआ भी है!
महिला आयोग की गिरिजा व्यास ने आपराधिक मामला दर्ज करने और कपिल सिब्बल ने माफ़ी मांगने की बातकही पर स्त्री लेखकों ने माफ़ी मांगने को ना काफी माना हैइतने गंदे आरोप लगा कर माफ़ी मांगना क्या स्त्रीलेखकों के विरुद्ध दूसरा बड़ा अनाचार नहीं होगा?
क्या दलित और स्त्री के खिलाफ ऐसे अपराधों की सजा सिर्फ माफ़ी है?