"कौन किसी का दर्द बांटे, सब यहाँ बीमार हैं.पत्थरों का शहर है, खिड़कियाँ बैकार हैं."क्या हम सब मिलकर इस संवेदनहीनता को तोड़ सकते हैं?
तो बताएं क्या उपाय किये जाएँ?