शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010


आलोचना के शालाखा-पुरुष: रामविलाश शर्मा


गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

मुक्तिबोध साहित्य-विमर्श

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010


आज के दौर में संवेदनहीनता बहुत गहरा गई है। किसी ने कहा है-

"कौन किसी का दर्द बांटे, सब यहाँ बीमार हैं.
पत्थरों
का शहर है, खिड़कियाँ बैकार हैं."
क्या
हम सब मिलकर इस संवेदनहीनता को तोड़ सकते हैं?

तो बताएं क्या उपाय किये जाएँ?